नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा है कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति तथा आध्यात्मिक परम्परा की दुनिया सराहना कर रही है और आयुर्वेद, योग तथा प्राणायाम को अपनाते हुए विश्व समुदाय आज इसका लाभ ले रहा है।
श्रीमती मुर्मु ने रविवार को 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि प्राचीन काल से ही पूरी मानवता हमारी सभ्यता, संस्कृति तथा आध्यात्मिक परम्परा से लाभान्वित होती रही है। आयुर्वेद, योग तथा प्राणायाम को विश्व समुदाय ने सराहा और अपनाया है। अनेक महान विभूतियों ने हमारी आध्यात्मिक एवं सामाजिक एकता की धारा को अविरल प्रवाह दिया है। यह गर्व की बात है कि आज का भारत, नये आत्म-विश्वास के साथ अपनी गौरवशाली परम्पराओं के प्रति सचेत होकर आगे बढ़ रहा है।
श्रीमती मुर्मु ने कहा “केरल में जन्मे, महान कवि, समाज सुधारक और आध्यात्मिक विभूति श्रीनारायण गुरु के अनुसार उस स्थान को आदर्श माना जाता है जहां जाति और पंथ के भेदभाव से मुक्त होकर सभी लोग बंधुत्व के साथ रहते हैं। मैं श्रीनारायण गुरु के इस विचार को उनकी भाषा में दोहराने का प्रयास करती हूं-‘जाति-भेदम् मत-द्वेषम्, एदुम्-इल्लादे सर्वरुम् सोद-रत्वेन वाडुन्न, मात्रुका-स्थान मानित।”
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में हमारी आध्यात्मिक परंपरा के पवित्र स्थलों को जन-चेतना के साथ जोड़ा गया है। नियत अवधि में गुलामी की मानसिकता के अवशेषों से मुक्त होने का समयबद्ध संकल्प किया गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा में दर्शन, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, गणित, साहित्य तथा कला की महान विरासत उपलब्ध है। यह गर्व की बात है कि ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ जैसे प्रयासों से भारतीय परंपरा में उपलब्ध रचनात्मकता को संरक्षित और प्रसारित किया जा रहा है। यह मिशन भारत की लाखों अमूल्य पाण्डुलिपियों में संचित विरासत को आधुनिक संदर्भों में आगे बढ़ाएगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय भाषाओं तथा भारतीय ज्ञान परम्परा को प्राथमिकता देकर हम आत्म-निर्भरता के प्रयासों को सांस्कृतिक आधार प्रदान कर रहे हैं। भारत का संविधान अब आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। संविधान को भारतीय भाषाओं में पढ़ने और समझने से देशवासियों में संवैधानिक राष्ट्रीयता का प्रसार होगा तथा आत्म-गौरव की भावना मजबूत होगी।
