देशभर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों को लेकर विरोध तेज हो गया है। इन नियमों का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना बताया गया है, लेकिन इसके विरोध में कई जगह छात्र और सामाजिक संगठन सड़कों पर उतर आए हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली सहित कई राज्यों में सामान्य वर्ग के छात्र संगठनों और कुछ सामाजिक समूहों का कहना है कि नए प्रावधानों में केवल अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लिए शिकायत की व्यवस्था स्पष्ट है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए समान और भरोसेमंद व्यवस्था नहीं दिखती। इसी आशंका के चलते लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि कहीं इससे एक वर्ग के साथ अन्याय की नई स्थिति तो नहीं बन जाएगी। कई विश्वविद्यालय परिसरों के बाहर प्रदर्शन हुए हैं और कुछ जगह प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी है। नए नियमों के मुताबिक, अब चाहे सरकारी कॉलेज हो या निजी यूनिवर्सिटी, हर जगह एक ‘इक्विटी सेल बनाना ज़रूरी होगा. ये सेल एक तरह की अदालत जैसा काम करेगी. अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो वह यहां जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. कमेटी की सिफारिश पर संस्थान को उस पर तुरंत एक्शन लेना होगा.उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव ख़त्म करने के लिए यूजीसी ने अपने मौजूदा नियमों को और सख़्त किया है.
13 जनवरी को यूजीसी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनिमय 2026 जारी किया जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में समानता को बढ़ाना है ताकि किसी भी वर्ग के छात्र, छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके. इसका उद्देश्य
धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता के आधार पर छात्र-छात्राओं से भेदभाव ना हो और विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों, विकलांगों और इनमें से किसी भी वर्ग के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव ख़त्म किया जा सके. इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा दिया जा सके.
इसके मुताबिक़ जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव है.
विवाद की मूल वजह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को शामिल करना है. इसके पहले, ड्राफ्ट में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में केवल एससी और एसटी (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) को रखा गया था.
लेकिन अब इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है, जिसका कई जगह कुछ लोग विरोध कर रहे हैं.
इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है.
क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकते हैं.
नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़ उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक इक्विटी कमेटी (समता समिति) बनाई जाएगी जिसमें ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.
ये समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी.
विरोध करने वालों का तर्क ये भी है कि इस समिति में सामान्य वर्ग के लोगों के प्रतिनिधित्व की बात क्यों नहीं कही गई है. उनके मुताबिक़ ‘इक्विटी कमेटी’ में सामान्य वर्ग का सदस्य नहीं होने से जांच निष्पक्ष नहीं हो सकेगी.दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षा में ओबीसी छात्रों को भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें सुरक्षा देना ज़रूरी है.
