जिले में जीवंत हो रही मिथिला की विरासत, अर्चना मिश्रा बेटियों को सिखा रहीं परंपरागत पेंटिंग का हुनर

गोपालगंज। जिले में जहां एक ओर आधुनिकता का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक कला को संजोने और आगे बढ़ाने की मिसाल भी सामने आ रही है। मिथिला की बेटी अर्चना मिश्रा गोपालगंज में रहकर मिथिला पेंटिंग की विरासत को न केवल जीवित रखे हुए हैं, बल्कि स्थानीय बेटियों को इस अनमोल कला से जोड़ने का सराहनीय कार्य भी कर रही हैं। अर्चना मिश्रा मूल रूप से मिथिला क्षेत्र से संबंध रखती हैं और वर्तमान में अपने पति के साथ गोपालगंज में रहती हैं। उनके पति जिला मत्स्य विभाग में पदाधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। विवाह के बाद भी अर्चना ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को नहीं छोड़ा, बल्कि उसे और मजबूती के साथ आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

अर्चना बताती हैं कि मिथिला पेंटिंग उन्हें विरासत में मिली है। बचपन से ही उनके घर का माहौल कला से जुड़ा रहा। उनकी दादी और मां पारंपरिक मिथिला पेंटिंग बनाती थीं। घर की दीवारों और कागज पर उकेरे गए रंग-बिरंगे चित्रों को देखते-देखते ही उनके भीतर इस कला के प्रति लगाव पैदा हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने खुद भी पेंटिंग करना शुरू किया और परिवार के साथ इस परंपरा का हिस्सा बन गईं। शादी के बाद उन्हें ससुराल में भी इस कला को आगे बढ़ाने के लिए भरपूर सहयोग मिला। उनके पति, सास और ससुर ने हमेशा उनका उत्साह बढ़ाया।

अर्चना कहती हैं कि पेंटिंग से जुड़ी सामग्री की कभी कमी नहीं होने दी गई, जिससे उनका आत्मविश्वास और बढ़ा। गोपालगंज में रहते हुए अर्चना मिश्रा ने इस कला को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा। वे आसपास की लड़कियों और महिलाओं को मिथिला पेंटिंग सीखने के लिए प्रेरित करती हैं। अपने खाली समय में वे उन्हें प्रशिक्षण देती हैं और इस पारंपरिक कला के बारीक पहलुओं से परिचित कराती हैं। उनका मानना है कि यह कला सिर्फ चित्रकारी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और पहचान का अहम हिस्सा है। उनका कहना है कि जहां भी वे रहती हैं, वहां इस कला को सिखाने का प्रयास करती हैं, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। वे चाहती हैं कि अधिक से अधिक बेटियां आत्मनिर्भर बनें और इस कला के माध्यम से अपनी पहचान स्थापित करें।

स्थानीय स्तर पर उनके इस प्रयास की सराहना हो रही है। कला प्रेमियों का मानना है कि यदि इस तरह के प्रयास जारी रहे तो गोपालगंज में भी मिथिला पेंटिंग की एक अलग पहचान बन सकती है। अर्चना मिश्रा का यह प्रयास न केवल एक कला को जीवंत कर रहा है, बल्कि बेटियों को आत्मनिर्भर बनने की राह भी दिखा रहा है। उनकी पहल यह साबित करती है कि अगर संकल्प मजबूत हो, तो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाते हुए सांस्कृतिक धरोहर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।

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