लिव-इन से लेकर विरासत तक… असम का नया कानून क्यों बना चर्चा का केंद्र?

गुवाहाटी। राज्य मंत्रिमंडल ने 13 मई को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट बैठक में इस प्रस्तावित कानून के मसौदे को मंजूरी दी थी। यह बैठक गुवाहाटी स्थित कोइनाधारा के नंबर-1 स्टेट गेस्ट हाउस में आयोजित हुई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि यूसीसी विधेयक को मौजूदा विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा। विधानसभा का यह सत्र 21 मई से शुरू हुआ है और 26 मई को समाप्त होना है। सरकार के अनुसार, प्रस्तावित यूसीसी कानून के दायरे से अनुसूचित जनजाति (पहाड़ी) और अनुसूचित जनजाति (मैदानी) समुदायों को बाहर रखा गया है। साथ ही पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाज, प्रथाएं और अनुष्ठान भी इस कानून से मुक्त रहेंगे। असम सरकार द्वारा प्रस्तावित यूसीसी मुख्य रूप से चार प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित है – शादी की न्यूनतम उम्र तय करना, बहुविवाह पर रोक, पैतृक संपत्ति में बेटियों को समान अधिकार देना और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों को कानूनी दायरे में लाना। वहीं, राज्य सरकार का कहना है कि यह विधेयक सामाजिक और पारिवारिक मामलों में एक समान नागरिक व्यवस्था लागू करने की दिशा में अहम कदम साबित होगा। हाल ही में हुए असम विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 126 सदस्यों वाले सदन में 82 सीटें जीतकर जबरदस्त जीत हासिल की। अपने सहयोगी दल असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ मिलकर 10-10 सीटें जीतीं। विधानसभा में अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की कुल सीटों की संख्या 102 हो गई है। असम विधानसभा के चल रहे अधिवेशन के तीसरे दिन सोमवार को सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक सदन में पेश कर दिया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अनुपस्थिति में संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने विधानसभा में बिल काे प्रस्तुत किया। यदि यह बिल पारित होता है, तो उत्तराखंड और गुजरात के बाद, असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन जाएगा जो यूसीसी कानून लागू करेगा। विधानसभा में विधेयक पेश होते ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच इस मुद्दे को लेकर तीखी चर्चा देखने को मिली। माना जा रहा है कि चालू सत्र के दौरान इस विधेयक पर विस्तृत बहस होगी और 27 मई को इसे पारित किया जा सकता है।

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