नई दिल्ली। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने गृह मंत्रालय के उस फैसले पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है, जिसके तहत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से जुड़े रिकॉर्ड को ‘गोपनीय’ श्रेणी में रखा गया था। आयोग ने सुरक्षा और संवेदनशीलता का हवाला देते हुए इस मामले को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे से बाहर रखने के सरकार के कदम को पूरी तरह सही और तर्कसंगत माना है।
दस्तावेज सार्वजनिक होने से जान का खतरा: गृह मंत्रालय
यह पूरा मामला नीरज शर्मा नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक आरटीआई अर्जी से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने ट्रस्ट गठन से जुड़ी योजना और सरकारी आदेश की सत्यापित प्रति मांगी थी। सीआईसी के समक्ष हुई सुनवाई में गृह मंत्रालय ने दलील दी कि ट्रस्ट से जुड़ी जानकारियां बेहद संवेदनशील हैं और इन्हें सार्वजनिक करने से संबंधित व्यक्तियों की जान को गंभीर खतरा हो सकता है। इसी आधार पर आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जी) के तहत जानकारी देने से इनकार किया गया था, जिसे तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त हीरालाल सामरिया ने स्वीकार कर लिया।
ट्रस्ट एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था, सरकारी नियंत्रण नहीं
सुनवाई के दौरान आयोग ने ट्रस्ट के कानूनी दर्जे पर भी स्थिति स्पष्ट की:
- कोई वित्तीय मदद नहीं: गृह मंत्रालय और ट्रस्ट के वकीलों ने साफ किया कि इस संस्था का सरकार के पास न तो मालिकाना हक है और न ही इसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई सरकारी फंड मिलता है।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: इस ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार की अपनी पहल पर नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के अनुपालन में एक ट्रस्ट डीड के जरिए किया गया था।
- पब्लिक अथॉरिटी नहीं: इन अकाट्य तर्कों के आधार पर सीआईसी ने माना कि यह ट्रस्ट आरटीआई अधिनियम की धारा 2(एच) के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ (Public Authority) की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिए यह सूचना कानून के प्रति जवाबदेह नहीं है।
