रांची। झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और शिक्षा व्यवस्था में उनके व्यापक उपयोग की मांग को लेकर शनिवार को रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में राज्यस्तरीय जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा कॉन्क्लेव आयोजित किया गया। पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की के संयोजन में आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यभर से भाषाविद, शिक्षाविद, प्रोफेसर, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक मांदर वादन के साथ हुई।
भाषाओं के संरक्षण पर सरकार से पहल की मांग
कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की नौ मान्यता प्राप्त जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं—कुरमाली, पंचपरगनिया, खोरठा, हो, संताली, खड़िया, नागपुरी, कुड़ुख और मुंडारी—लंबे समय से उपेक्षा का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्क्लेव में आए सुझावों को दस्तावेज के रूप में तैयार कर मुख्यमंत्री और राज्य सरकार को सौंपा जाएगा। उनका कहना था कि झारखंड राज्य का गठन केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि यहां की भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान के संरक्षण के लिए हुआ है।
बंधु तिर्की ने कहा कि प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई सुनिश्चित करने के लिए योजनाबद्ध पहल की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जो राजनीतिक दल झारखंडी भाषाओं की उपेक्षा करेंगे, उन्हें जनता स्वीकार नहीं करेगी।
कई प्रस्ताव पारित, क्लस्टर सिस्टम समाप्त करने की मांग
कॉन्क्लेव में डॉ. सुभाष चंद्र मुंडा, डॉ. प्रकाश चंद्र उरांव, डॉ. चरण हेंब्रम, किशोर केरकेट्टा, डॉ. गजाधर महतो, डॉ. खालिक अहमद, डॉ. राजाराम महतो, डॉ. अर्थोनी मुंडा सहित कई भाषाविदों ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने झारखंडी भाषाओं के संरक्षण, शोध और शिक्षा में उनके विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम के अंत में सर्वसम्मति से कई प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की अस्मिता और सम्मान की रक्षा, शिक्षा व्यवस्था में क्लस्टर सिस्टम समाप्त करने तथा भाषाओं के विकास के लिए ठोस सरकारी नीति लागू करने की मांग प्रमुख रही। कार्यक्रम में विभिन्न भाषाओं के विद्वानों और शिक्षाविदों को सम्मानित भी किया गया।
