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14 जुलाई को ब्रिटीश हुकूमत को जड़ से ऊखाड़ फेंकने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया था

विजय केसरी  (कथाकार स्तंभकार)

 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी द्वारा लिए गए  ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रस्ताव तो सदा देशवासियों के  मानस पटल पर अंकित रहता है, लेकिन देशवासियों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि इस आंदोलन का बीजारोपण 14 जुलाई 1942 के अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के महाराष्ट्रा के वर्धा  अधिवेशन में  हो चुका था। आगे चलकर ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने में  यह प्रस्ताव मील का पत्थर साबित हुआ था। इस  ऐतिहासिक तिथि के  महत्व को हम सब भूलते चले जा रहे हैं। 8 अगस्त,भारत छोड़ो आंदोलन के वर्ष गांठ पर देशवासी  देशभर में कार्यक्रम आयोजित करते रहते  हैं, लेकिन जिस दिन इस प्रस्ताव का बीजारोपण  हुआ था, उस ऐतिहासिक तिथि  पर  कहीं भी कोई कार्यक्रम नहीं होता है। इस विषय पर हम सबों को गंभीरता  से विचार करने की जरूरत है। हम सबों को 14 जुलाई को महाराष्ट्र के वर्धा में आयोजित  अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी की बैठक में  लिए गए ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में कार्यक्रमों का आयोजन करना  चाहिए। सच्चे अर्थों में यह आयोजन हमारे स्वाधीनता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

14 जुलाई 1942 को महाराष्ट्र के वर्धा  में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की ऐतिहासिक बैठक में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रारंभिक प्रस्ताव पारित किया गया था । इस बैठक में क्रिप्स मिशन की असफलताओं के बाद भारत की स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की मंजूरी दी गई थी । इस ऐतिहासिक वर्धा अधिवेशन  में स्पष्ट रूप से मांग की गई कि भारत में ब्रिटिश शासन का अंत तत्काल होना चाहिए, ताकि भारत अपनी रक्षा कर सके और द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों को सफल होने में मदद मिले।कार्यसमिति ने महात्मा गांधी को इस अहिंसक जन-आंदोलन का पूर्ण प्रभार और नेतृत्व सौंपने का निर्णय लिया था।

    वर्धा में प्रस्तुत इस ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव को जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित किया गया और सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसका समर्थन किया था। वर्धा की कार्यसमिति द्वारा तैयार किए गए इस मसौदे को 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में ‘अखिल भारतीय कांग्रेस समिति’ के सत्र में औपचारिक रूप से पारित किया गया, जिसके बाद महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। हम सबों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि क्रिप्स के जाने के बाद, गांधीजी ने एक प्रस्ताव तैयार किया, जिसमें ब्रिटिश वापसी और किसी भी जापानी आक्रमण के खिलाफ अहिंसक असहयोग आंदोलन का आह्वान किया गया। 

 वर्धा में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक  में संघर्ष के विचार को स्वीकार किया गया और ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वतंत्रता की माँग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया। मसौदे में यह प्रस्ताव रखा गया था कि अगर अंग्रेज माँगें नहीं मानते तो व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन किया जाएगा। प्रस्ताव में अंकित किया  गया कि अतः समिति भारत की स्वतंत्रता और स्वाधीनता के अविभाज्य अधिकार की पुष्टि के लिए, व्यापकतम संभव पैमाने पर अहिंसक आधार पर जन संघर्ष शुरू करने की मंजूरी देती है, ताकि देश पिछले 22 वर्षों के शांतिपूर्ण संघर्ष के दौरान एकत्रित की गई समस्त अहिंसक शक्ति का उपयोग कर सकें। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अहिंसा ही इस आंदोलन का आधार है।हालांकि, पार्टी के भीतर यह विवादास्पद साबित हुआ। कांग्रेस के एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने इस फैसले के विरोध में कांग्रेस छोड़ दी, और कुछ स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर के संगठनकर्ताओं ने भी। 

  जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद इस आह्वान से आशंकित और आलोचक थे, लेकिन उन्होंने इसका समर्थन किया और अंत तक गांधी के नेतृत्व में बने रहे। सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा ने खुले तौर पर और उत्साहपूर्वक इस तरह के अवज्ञा आंदोलन का समर्थन किया, जैसा कि अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण जैसे कई वरिष्ठ गांधीवादियों और समाजवादियों ने किया था।  हम सबों को यह याद रखना चाहिए कि संवैधानिक गतिरोध को हल करने में क्रिप्स मिशन की विफलता ने संवैधानिक प्रगति पर ब्रिटेन के अपरिवर्तित रवैये को उजागर कर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि अब और चुप्पी साधे रखना, भारतीयों से परामर्श किए बिना उनके भाग्य का फैसला करने के ब्रिटिश अधिकार को स्वीकार करने के समान होगा। 

 चावल, नमक आदि की बढ़ती कीमतों और कमी के कारण, और बंगाल तथा उड़ीसा में नावों पर कब्ज़ा करने जैसे कारणों से, जन असंतोष था। जापान की संभावित बढ़त के खिलाफ असम, बंगाल और उड़ीसा में ब्रिटेन द्वारा “जलाकर मार डालने” की नीति अपनाने की आशंका थी। दक्षिण-पूर्व एशिया में अंग्रेजों की पराजय और आसन्न ब्रिटिश पतन की खबरों ने असंतोष व्यक्त करने की जन-इच्छा को और बढ़ा दिया था । ब्रिटिश शासन की स्थिरता में लोगों का विश्वास इतना कम हो गया था कि लोग बैंकों और डाकघरों से अपनी जमा राशि निकालने लगे थे। जिस तरह से अंग्रेजों ने दक्षिण-पूर्व एशिया से लोगों को निकाला और अपनी प्रजा को उनके भाग्य पर छोड़ दिया  था।  भारतीय शरणार्थियों के लिए ब्लैक रोड और विशेष रूप से यूरोपीय शरणार्थियों के लिए व्हाइट रोड। एक एशियाई शक्ति द्वारा पराजय ने श्वेत प्रतिष्ठा को चकनाचूर कर दिया और शासकों की नस्लवादी प्रवृत्ति को उजागर कर दिया। नेतृत्व जनता को संभावित जापानी आक्रमण के लिए तैयार करना चाहता था।

 कांग्रेस कार्यसमिति ने 14 जुलाई 1942 को वर्धा में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया था। वहीं अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने 8 अगस्त 1942 को बंबई में कुछ संशोधनों के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था । अंग्रेज़ कार्रवाई के लिए तैयार थे। अगले ही दिन, 9 अगस्त को, महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू और अबुल कलाम आज़ाद जैसे प्रमुख कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। युद्ध के बाकी समय अधिकांश नेताओं ने जेल में और जनता से दूर रहकर बिताया। भारत छोड़ो प्रस्ताव के तहत  संकल्प लिया गया कि भारत में ब्रिटिश शासन को तत्काल समाप्त करने की मांग करें। सभी प्रकार के फासीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के लिए स्वतंत्र भारत की प्रतिबद्धता की घोषणा करें। ब्रिटिश वापसी के बाद भारत में एक अस्थायी सरकार का गठन करना। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन को मंजूरी दी।  गांधीजी को संघर्ष का नेता नामित किया गया। ये निर्देश गोवालिया टैंक की बैठक में स्पष्ट रूप से बताए गए थे, लेकिन वास्तव में जारी नहीं किए गए। ये समाज के विभिन्न वर्गों के लिए थे।सरकारी कर्मचारी  इस्तीफा न दें, बल्कि कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करें। सैनिक सेना मत छोड़ें, लेकिन अपने देशवासियों पर गोली  ना चलाएं। छात्र अगर आत्मविश्वास है तो पढ़ाई छोड़ दें। किसान  यदि ज़मींदार सरकार विरोधी हैं, तो आपसी सहमति से लगान दें, और यदि ज़मींदार सरकार समर्थक हैं, तो लगान न दें। राजकुमारों जनता का समर्थन करें और अपने लोगों की संप्रभुता को स्वीकार करें।  रियासतों के लोग केवल तभी शासक का समर्थन करें जब वह सरकार विरोधी हो और अपने आप को भारतीय राष्ट्र का हिस्सा घोषित करें। 

 गांधीजी ने प्रसिद्ध हो चुके उक्त  आह्वान के साथ आगे कहा कि यह एक छोटा सा मंत्र है, जो मैं तुम्हें देता हूँ। इसे अपने हृदय में अंकित कर लो और अपनी हर सांस में इसे अभिव्यक्त करो। मंत्र है, ‘करो या मरो’  यह प्रस्ताव 7 अगस्त, 1942 के अधिवेशन में लिया गया था। हम या तो भारत को आज़ाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान गंवा देंगे।  हम अपनी गुलामी को जारी होते देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे। इसलिए समस्त देशवासियों को 14 जुलाई 1942 को  कांग्रेस कार्यसमिति के द्वारा  लिए गए उक्त प्रस्ताव की स्मृति में स्वाधीनता सेनानियों को जरूर याद करना चाहिए। यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी

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