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रक्सौल एयरपोर्ट के निर्माण की दिशा में बड़ी प्रगति, 10 कंपनियों ने भरी तकनीकी बोली

  • 352 एकड़ में बनेगा एयरपोर्ट, A320-बोइंग 737 उतर सकेंगे, 2 साल में पूरा करने का लक्ष्य

पटना, डेस्क।

भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रक्सौल में बहुप्रतीक्षित एयरपोर्ट के निर्माण को लेकर अब काम तेज हो गया है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण यानी एएआई ने एयरपोर्ट के डिजाइन और इंजीनियरिंग परामर्श के लिए टेंडर जारी किया था, जिसके जवाब में देश-विदेश की 10 प्रतिष्ठित कंपनियों ने तकनीकी बोलियां जमा की हैं।

अब इन बोलियों का तकनीकी मूल्यांकन किया जाएगा। इसके बाद सबसे योग्य कंपनी का चयन कर उसे विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर, संरचनात्मक डिजाइन और निर्माण का ब्लूप्रिंट तैयार करने की जिम्मेदारी दी जाएगी।

  • इन 10 कंपनियों ने भरी बोली

राइट्स लिमिटेड, निप्पॉन कोई इंडिया, टिप्प्सा इंडिया, ध्रुव कंसलटेंसी सर्विसेज, आरवी एसोसिएट्स, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड, स्टप कंसलटेंट्स, वैपकॉस लिमिटेड सहित 10 कंपनियां इस दौड़ में शामिल हैं।

  • क्या खास होगा रक्सौल एयरपोर्ट में :

-बड़े विमानों की होगी लैंडिंग

एयरपोर्ट बनने के बाद यहां एयरबस ए320 और बोइंग 737 जैसे बड़े विमान उतर सकेंगे।

  • नदी पर बनेगा रनवे पुल रनवे के विस्तार के लिए नदी के ऊपर अत्याधुनिक पुल बनाया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार यह देश का पहला ऐसा एयरपोर्ट होगा जहां रनवे का एक हिस्सा नदी पर बने पुल से गुजरेगा।
  • अंतरराष्ट्रीय मानक परियोजना के तहत रनवे के साथ एप्रन, टैक्सीवे और आइसोलेशन बे भी विकसित किए जाएंगे।
  • 2 साल में पूरा होगा काम

एएआई ने कंसलटेंसी और निर्माण के लिए कुल 730 दिन यानी लगभग 2 साल की समय-सीमा तय की है। टेंडर 6 मई 2026 को जारी हुआ था। प्री-बिड मीटिंग 13 मई को नई दिल्ली में हुई और बोलियां 1 जून तक जमा की गईं।

  • जमीन और फंड की स्थिति

प्रस्तावित एयरपोर्ट 352 एकड़ जमीन पर बनेगा। इसमें से 213 एकड़ जमीन पहले से उपलब्ध है। बची हुई 139 एकड़ जमीन के अधिग्रहण का काम अंतिम चरण में है। इसके लिए केंद्र सरकार ने 10 जनवरी 2026 को 207.70 करोड़ रुपये की स्वीकृति दे दी है।

1962 में बना यह एयरपोर्ट फिलहाल निष्क्रिय है। अब इसे सामरिक दृष्टि से भारतीय वायुसेना के उपयोग के लायक भी बनाया जाएगा।

  • सीमावर्ती क्षेत्र के लिए गेम-चेंजर

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि यह परियोजना राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी से जोड़ेगी। इससे चंपारण क्षेत्र में व्यापार, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिलेगी।

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