नई दिल्ली : सरकार ने समग्र शासन व्यवस्था के अंतर्गत न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए गुरुवार को राज्य सभा में कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की तर्ज पर एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के प्रस्ताव पर विचार हुआ है और यह मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष लम्बित है।
विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन में प्रश्नकाल के दौरान अपने मंत्रालय से जुड़े सवालों पर सदस्यों के अनुपूरक प्रश्नों के जवाब देते हुए कहा कि आईएएस आईपीए की तरह न्यायाधीशों की भर्ती के लिए एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की व्यवस्था पर अनुच्छेद 312 के तहत सरकार को किसी अखिल भारतीय सेवा के गठन का अधिकार है।
श्री मेघवाल ने कहा कि इस विषय पर न्यायाधीशों के सम्मेलन में भी चर्चा हो चुकी है। इस पर राज्यों के उच्च न्यायालयों की भी राय ली गयी है। मामला उच्चतम न्यायालय के विचाराधीन है और यह अभी ‘लंबित है।’
उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग जैसे प्रस्ताव पर पुनर्विचार की योजना के बारे में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री ने कहा कि जैसा कि सभी जानते हैं कि इस तरह के पारित कानून को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था। उसके बाद ऐसी नियुक्तियों के लिए प्रक्रिया संबंधी ज्ञापन (मेमोरेंडा ऑफ प्रासेस) को अंतिम रूप देने का काम चल रहा है। इसके तय होने के बाद आगे के कदम के बारे में विचार किया जाएगा।
उन्होंने कांग्रेस के राजीव शुक्ल के जिलास्तरीय न्यायपालिका में रिक्तियों और लंबित मामलों के बोझ के एक सवाल पर कहा कि इनकी भर्तियों के लिए 16 राज्यों में राज्य लोक सेवा आयोगों और बाकी जगहों पर 13 उच्च न्यायालयों द्वारा भर्ती परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा 7 साल के अनुभव वाले अधिवक्ता को भी अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के रूप में चुना जा सकता है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने जिला और सत्र न्यायालयों में स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाई है। 2027 में जिलास्तरीय अदालतों में कुल स्वीकृत पद 19518 थे जिनमें 9300 से भी अधिक की वृद्धि कर इन्हें 25893 कर दिया गया है। उन्होंने कहा जिलास्तरीय न्यायपालिका में नियुक्ति की परीक्षाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोंगों और महिलओं की भर्तियां भी हो रही हैं। उन्होंने कहा, ‘महिलाएं अब बड़ी संख्या में आ रही है। एक राज्य में एक परीक्षा में सफल महिलाओं का अनुपात 50 प्रतिशत से अधिक था।’
उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की व्यवस्था के बारे में डीएमके के डॉ एम तंबीदुरै के एक अनुपूरक प्रश्न पर मंत्री ने कहा कि उच्चतम न्यायालय इसकी आवश्यकता नहीं समझता।
उन्होंने कहा कि भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र है। सरकार न्यायपालिका स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए उसके साथ मिल कर न्यायाधीशों के लिए काम करने का उपयुक्त वातावरण सुनिश्चित करने का प्रयास करती है
