पश्चिमी सिंहभूम। जिले में पारिवारिक पेंशन मिलने में हुई लंबी देरी के मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने बैंक ऑफ इंडिया (बीओआई) के खिलाफ सख्त फैसला सुनाया है। आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने बैंक को सेवा में लापरवाही का दोषी मानते हुए शिकायतकर्ता सल्बन्ती बोदरा को 01 लाख रुपये मुआवजा और 15 हजार रुपये वाद व्यय के रूप में देने का निर्देश दिया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि 45 दिनों के भीतर पैसे का भुगतान नहीं किया गया तो पूरी राशि पर 09 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
जानकारी के अनुसार, सल्बन्ती बोदरा ने 30 जून 2022 को पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया था। प्रक्रिया के तहत रेलवे ने 23 अगस्त 2023 को बैंक से लास्ट पेमेंट सर्टिफिकेट (एलपीसी) मांगा, लेकिन बैंक ने 17 अक्टूबर 2023 को अधूरी जानकारी भेजी। इसके कारण पेंशन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
मामले को लेकर रेलवे विभाग ने 10 जून 2024 और 29 नवंबर 2024 को दो बार स्मरण पत्र भेजकर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने का आग्रह किया, लेकिन बैंक की ओर से समय पर सही जानकारी नहीं दी गई। नतीते के तौर पर पेंशन जारी होने में लगातार देरी होती रही।
आखिरकार लंबी प्रतीक्षा के बाद शिकायतकर्ता को 28 फरवरी 2025 को पेंशन मिल सकी, जबकि यह भुगतान अक्टूबर 2023 तक हो जाना चाहिए था। इस तरह करीब 16 महीने की देरी हुई, जिससे महिला को गंभीर आर्थिक संकट के साथ मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
न्याय के लिए महिला को कई संस्थानों के चक्कर लगाने पड़े। उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में भी अपनी गुहार लगाई। इसके बाद मामला जिला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा।
सुनवाई के दौरान आयोग ने स्पष्ट कहा कि पेंशन किसी प्रकार की दया नहीं, बल्कि नागरिक का कानूनी अधिकार है। यह व्यक्ति के जीवनयापन का महत्वपूर्ण साधन है, इसलिए इससे जुड़ी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। आयोग ने माना कि पेंशन वितरण में बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराना उसकी जिम्मेदारी है।
बैंक ने अपनी सफाई में सीपीपीसी नागपुर को जिम्मेदार नहीं ठहराने की बात कही, लेकिन आयोग ने इस तर्क को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि बैंक की सभी इकाइयां एक ही तंत्र का हिस्सा हैं और उपभोक्ता को हुई क्षति के लिए पूरी संस्था जिम्मेदार होगी।
