रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड (सीयूजे) पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसके रजिस्ट्रार को पांच फरवरी को अदालत में हाजिर होने का निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय की जस्टिस राजेश कुमार की कोर्ट ने पीएचडी प्रवेश मामले में यूनिवर्सिटी के शपथ पत्र को झूठा बताते हुए प्रथम दृष्टया न्यायालय को गुमराह करने का मामला माना है।
दरअसल, याचिकाकर्ता अमित कुमार चौबे ने इंटरनेशनल रिलेशंस विभाग में वर्ष 2023-24 सत्र के लिए पीएचडी सीटों पर प्रवेश नीति को चुनौती दी है।
यूनिवर्सिटी ने अपने 22 अगस्त 2025 के पूरक शपथ-पत्र में दावा किया था कि वर्ष 2023-24 सत्र में तीन ओबीसी सीटें खाली थीं, जो सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को नहीं दी जा सकती थीं।
इन्हें अगले सत्र में कैरी फॉरवर्ड कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने 13 नवंबर 2025 के शपथ-पत्र में इसका खंडन करते हुए सीट मैट्रिक्स पेश किया, जिसमें कुल छह सीटें बताई गईं। एससी-1, एसटी-0, ओबीसी-4, ईडब्ल्यूएस-0, यूआर-1 सीट थी।
अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया भ्रामक माना और रजिस्ट्रार को गुरुवार को स्पष्टीकरण देने को कहा है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया अदालत को झूठे शपथ-पत्र से गुमराह किया गया लगता है। दरअसल, यह मामला आरक्षण नियमों और सीटों के कैरी फॉरवर्ड से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि कोई भी एजुकेशनल संस्थान में चाहे वह रिजर्व कैटेगरी का सीट क्यों न हो अगर रिजर्व कैटेगरी की विद्यार्थी नहीं है, तो उसे सीट को खाली नहीं रख सकते उस सीट को मेघावी विद्यार्थी से भरना होगा, यही उच्चतम न्यायालय कोर्ट और झारखंड उच्च न्यायालय का भी जजमेंट है।
याचिकाकर्ता ने कहा था कि इंटरनेशनल रिलेशंस विभाग में पीएचडी में नामांकन के लिए आवेदन दिया था, परीक्षा पास करने एवं इंटरव्यू होने के बाद भी उसका सलेक्शन नहीं किया हुआ था। वॉच जनरल कैटेगरी का था, जनरल सीट को ओबीसी के मेधावी विद्यार्थी से भर दिया गया था।
ओबीसी के तीन सीट को अगले सत्र के लिए कैरी फॉरवर्ड किया गया था। जिसे याचिकाकर्ता ने चुनौती दी है, याचिकाकर्ता कहा है कि एजुकेशनल संस्थान में सीटों को कैरी फॉरवर्ड नहीं किया जा सकता है
