मोदी सरकार की ओर से गुरुजी को पद्म भूषण सम्मान देने पर झामुमो ने जताया आभार

रांची। मोदी सरकार की ओर से झारखंड आंदोलन के प्रणेता, अलग झारखंड राज्य के निर्माता, पूर्व मुख्यमंत्री एवं झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक स्वर्गीय दिशोम गुरु शिबू सोरेन को पद्म भूषण सम्मान दिए जाने की घोषणा पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में खुशी की लहर है। झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद पांडेय ने रविवार को जारी बयान में केंद्र सरकार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस निर्णय का स्वागत किया।

पांडेय ने कहा कि यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आदिवासी–मूलवासी समाज के दशकों पुराने संघर्षों, आंदोलनों और बलिदानों की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता है। दिशोम गुरुजी भारतीय मिट्टी के सच्चे संघर्षशील सपूत थे, जिन्होंने भारत के जंगलों, पहाड़ों और गांवों में रहने वाले हाशिये पर खड़े समाज की आवाज को देश के सर्वोच्च सदनों तक पहुंचाया।

पांडेय ने कहा कि गुरुजी का संपूर्ण जीवन सामाजिक न्याय, जनसंघर्ष और लोकतांत्रिक आंदोलन की मिसाल रहा। जल, जंगल और जमीन की रक्षा उनके जीवन का केंद्रीय उद्देश्य रहा और उन्होंने आदिवासी–मूलवासी समाज को संगठित कर उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाया। नशा मुक्ति, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उनके प्रयासों ने समाज को नई दिशा दी।

पांडेय ने कहा कि पद्म भूषण सम्मान गुरुजी के योगदान को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन उनके ऐतिहासिक संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन में भूमिका और राष्ट्र निर्माण में योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह केवल झामुमो की नहीं, बल्कि गुरुजी के करोड़ों समर्थकों और आदिवासी–मूलवासी समाज की सामूहिक भावना है, जिसे आगे भी मजबूती से उठाया जाता रहेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के इतिहास में आज तक किसी आदिवासी व्यक्ति को भारत रत्न जैसा सर्वोच्च नागरिक सम्मान न मिलना यह दर्शाता है कि आदिवासी समाज को लंबे समय तक मुख्यधारा से अलग करके देखा गया।

उल्लेखनीय है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। किशोरावस्था में ही पिता की हत्या के बाद उनके जीवन ने संघर्ष का मार्ग चुना। महाजनी शोषण, जमीन की लूट और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध उन्होंने आंदोलन खड़ा किया। और ग्रामीणों को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की। जल, जंगल और जमीन की रक्षा उनके जीवन का केंद्रीय उद्देश्य रहा। नशा मुक्ति, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उनके प्रयासों ने आदिवासी-मूलवासी समाज को नई दिशा दी।

गुरुजी चार दशकों तक झारखंड आंदोलन का चेहरा रहे। वे तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और दुमका से आठ बार सांसद चुने गए। राज्यसभा सदस्य और केंद्र में मंत्री के रूप में भी उन्होंने अपनी भूमिका निभाई। 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संघर्ष और विचार आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

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