HomeBreaking Newsघाटशिला सीट पर असल मुकाबला ‘हेमंत’ बनाम ‘चंपई’

घाटशिला सीट पर असल मुकाबला ‘हेमंत’ बनाम ‘चंपई’

घाटशिला। झारखंड की घाटशिला विधानसभा सीट पर 11 नवंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए प्रचार अभियान रविवार शाम पांच बजे थम गया। आखिरी दिन इंडिया गठबंधन और एनडीए दोनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। नेताओं ने रोड शो, जनसभाओं और जनसंपर्क के जरिए मतदाताओं को लुभाने का हर प्रयास किया।
इस उपचुनाव में मुख्य मुकाबला झामुमो प्रत्याशी सोमेश चंद्र सोरेन और भाजपा उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन के बीच है। एक ओर झामुमो अपने दिवंगत विधायक रामदास सोरेन की राजनीतिक विरासत और सरकार के कार्यों पर भरोसा जता रहा है, वहीं भाजपा संगठन की मजबूती और मोदी सरकार की योजनाओं के बल पर जीत का दावा कर रही है।
हेमंत सोरेन सरकार के दूसरे कार्यकाल का यह पहला उपचुनाव है। राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल “सोमेश बनाम बाबूलाल” नहीं, बल्कि “हेमंत बनाम चंपई” की सियासी जंग के रूप में देख रहे हैं।
दरअसल, चंपई सोरेन, जिन्हें कोल्हान टाइगर कहा जाता है, लंबे समय तक झामुमो में सक्रिय रहे। हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद वह मुख्यमंत्री भी बनाए गए, लेकिन उनके जमानत पर बाहर आने के बाद चंपई सोरेन को यह पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद वह भाजपा में शामिल हो गए। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद सरायकेला सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की, लेकिन अपने बेटे बाबूलाल को घाटशिला से नहीं जिता पाए थे। इस बार भाजपा ने फिर उनके बेटे बाबूलाल को टिकट दिया है, जिससे यह चुनाव पिता-पुत्र दोनों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा की परीक्षा बन गया है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए भी घाटशिला उपचुनाव एक साख की जंग है। अगर झामुमो प्रत्याशी सोमेश सोरेन जीतते हैं, तो यह न केवल उनके दूसरे कार्यकाल के एक साल के कामकाज पर जनता की मुहर मानी जाएगी, बल्कि आदिवासी राजनीति में उनकी पकड़ भी और मजबूत होगी।

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