महिला दिवस पर विशेष :बिहार में महिला मुखियाओं की बदौलत बढ़ रही महिला साक्षरता

पटना । बिहार में महिला साक्षरता का सफर पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय रहा है। इसी का परिणाम है कि वर्ष 2001 में जहां महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 33.12 प्रतिशत थी, वह 2025 में बढ़कर लगभग 74 प्रतिशत पहुंच चुकी है। यह प्रगति न सिर्फ शिक्षा और जागरूकता अभियानों का नतीजा है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर महिला मुखियाओं के मजबूत नेतृत्व का भी उल्लेखनीय परिणाम रहा है। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी ने स्थानीय स्तर पर साक्षरता और आत्मनिर्भरता को गति दी है।

अफसाना बेगम- पूर्णिया जिले की प्रेरणादायक मुखिया

पूर्णिया जिले के धमदाहा ब्लॉक के अंतर्गत कुकरौन पश्चिम पंचायत की मुखिया अफसाना बेगम बचपन से ही महिलाओं की बेरोजगारी, असाक्षरता और आत्मविश्वास की कमी को करीब से देखती थीं। सरकारी स्कूल से 8वीं तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मदरसे से इंटर किया। गांव में बदलाव लाने की इच्छा थी तो पंचायत चुनाव में खड़ी हुईं और जीत हासिल की।

मुखिया बनने के बाद अफसाना ने पंचायत को महिला-केंद्रित बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने बाल विवाह पर रोक लगाने और लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया। नतीजा यह रहा कि बीते चार वर्षों में आधा दर्जन लड़कियां सरकारी शिक्षक बन गईं, जबकि कई अन्य इंटर के बाद ग्रेजुएशन कर रही हैं। महिलाओं को अंगूठे के निशान की बजाय हस्ताक्षर करना सिखाने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी, परिणामस्वरूप पंचायत की करीब 80 प्रतिशत महिलाएं स्वयं कागजातों पर हस्ताक्षर करती हैं।

यहां एक अन्य बड़ी समस्या बाजार की दूरी थी। महिलाओं को ताजे फल-सब्जियां खरीदने के लिए रोजाना 12 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था।

अफसाना ने पंचायत में ही हाट बसाया, जहां महिलाएं भी अपनी दुकानें चला रही हैं। इसके अलावा अन्य जरुरी सामानों के लिए 10 दर्जन से अधिक दुकानें खुलीं। इससे न केवल स्थानीय रोजगार में वृद्धि हुई, बल्कि अन्य पंचायतों से आने-जाने का समय और खर्च भी बचा। आज कुकरौन पश्चिम पंचायत की लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में रोजगार से जुड़ी हुई हैं।

आरती कुमारी- मिश्रौलिया पंचायत की पहली महिला

मुखिया

सीतामढ़ी जिले के डुमरा ब्लॉक अंतर्गत मिश्रौलिया पंचायत की मुखिया आरती कुमारी गांव की पहली महिला मुखिया बनीं। इससे पहले गांव वालों की सोच थी कि महिलाएं घर तक सीमित रहती हैं, लेकिन आरती ने इसे पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने साबित किया कि एक साक्षर और जागरूक महिला किसी पुरुष से कम नहीं होती।

आरती घर संभालने के साथ-साथ पंचायत के विकास के लिए सक्रिय रूप से काम करती हैं। उन्होंने स्कूलों में लड़कियों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए।

महिला सभाओं में लड़कियों की शिक्षा की महत्वपूर्णता बताई और उन्हें आत्मविश्वास के साथ करियर चुनने के लिए प्रेरित किया।

आरती बताती हैं कि पहले मैं कम बोलती थी, घर में रहती थी। मुखिया बनने का ख्याल भी नहीं आया था। लेकिन लॉकडाउन के दौरान ससुराल लौटने पर गांववालों ने साक्षर उम्मीदवार के रूप में मेरा समर्थन किया। कुछ लोगों ने विरोध भी किया कि अच्छे घर की बहू घर में ही शोभा देती है, लेकिन मैंने सजावटी पद नहीं, बल्कि वास्तविक काम चुना। आज वे दो बच्चों की मां होने के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं।

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