नई दिल्ली । उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) के इलाज के लिए स्वीकृत और निगरानी वाले क्लिनिकल ट्रायल के बाहर स्टेम सेल थेरेपी देना अनैतिक है और इसे चिकित्सकीय लापरवाही माना जाएगा।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यश चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम भारत संघ मामले में यह फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि ऑटिज़्म के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर न तो पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं और न ही इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता को साबित करने वाला कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध है।
पीठ ने कहा, “स्वीकृत क्लिनिकल ट्रायल के बाहर रोगियों में स्टेम सेल का हर उपयोग अनैतिक है और इसे चिकित्सकीय लापरवाही माना जाएगा।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की थेरेपी केवल वैज्ञानिक और चिकित्सकीय अनुसंधान को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से, विधिवत स्वीकृत और नियंत्रित क्लिनिकल ट्रायल के अंतर्गत ही दी जा सकती है।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत स्टेम सेल को “ड्रग” की श्रेणी में रखा जाना, ऑटिज़्म के इलाज में इसके नियमित चिकित्सकीय उपयोग को स्वतः वैध नहीं बनाता।
फैसले में कहा गया, “हालांकि एएसडी के उपचार में प्रयुक्त स्टेम सेल को ड्रग्स एक्ट, 1940 के तहत ड्रग माना गया है, लेकिन मात्र यह तथ्य इसे नियमित क्लिनिकल सेवा के रूप में उपयोग करने की अनुमति नहीं देता।”
चिकित्सकों के कर्तव्य पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि डॉक्टरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एक विवेकशील चिकित्सक की तरह उचित सावधानी, कौशल और ज्ञान का पालन करें।
यदि कोई चिकित्सक ऐसा उपचार देता है, जिसके पक्ष में विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं या जिसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थाएं स्पष्ट रूप से अनुशंसित नहीं करतीं, तो वह उचित चिकित्सकीय मानक का उल्लंघन माना जाएगा।
न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की 6 दिसंबर 2022 की सिफारिशों, राष्ट्रीय स्टेम सेल अनुसंधान दिशानिर्देश, 2017, तथा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जारी राष्ट्रीय नैतिक दिशानिर्देशों का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि इन सभी दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि ऑटिज़्म के इलाज में स्टेम सेल थेरेपी को नियमित उपचार के रूप में अनुशंसित नहीं किया गया है और इसे केवल स्वीकृत क्लिनिकल ट्रायल के तहत ही किया जा सकता है।
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ नाथ, श्री प्रतीक के. चड्ढा, श्री असजद हुसैन, श्री अनुनय चौधरी, श्री श्रीकर एचुरी और श्री अनिकेत चौहान ने पक्ष रखा। ।
