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डी जे की शोर में थम गई फाग गीतों की गूंज व गांव की चौपाल

बिहारशरीफ ।फाल्गुन मास के आगमन के साथ ही नालंदा जिले के विभिन्न गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता था।

संध्या ढलते ही गांव की चौपाल पर ग्रामीणों की टोली जुटती और आधी रात तक पारंपरिक फाग गीतों की मधुर स्वर-लहरियां वातावरण में गूंजती रहती थीं।

“राम खेले होली, लखन खेले होली” और “गोरिया करी के श्रृंगार, पिसे ले चलली हरदिया” जैसे गीत ढोल-मंजीरे की थाप पर गाए जाते, जिनमें लोक संस्कृति, आस्था और प्रेम का सुंदर संगम झलकता था।होली की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती थीं।

बच्चे घर-घर जाकर होलिका दहन के लिए लकड़ियां इकट्ठा करते, जो सामूहिक सहयोग और सहभागिता का प्रतीक था। होलिका दहन के दिन पूरे गांव की उपस्थिति में विधि-विधान से अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती और फाग गीतों से वातावरण भक्तिमय हो उठता।अगली सुबह लोग होलिका की राख को शुभ मानकर एक-दूसरे पर लगाते। इसके बाद रंग, गुलाल, हंसी-ठिठोली और आपसी मेल-मिलाप का दौर चलता। शाम को साफ वस्त्र पहनकर लोग एक-दूसरे के घर जाते और गले मिलकर शुभकामनाएं देते।

आज बदलते समय में डीजे और अश्लील गीतों के बढ़ते चलन से यह परंपरागत होली धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है, जिससे सामाजिक एकता और लोक-संस्कृति भी प्रभावित हो रही है।

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