पुरी। भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा केवल आस्था का पर्व ही नहीं, बल्कि अनेक पौराणिक परंपराओं और लीलाओं से भी जुड़ी हुई है। इन्हीं में से एक है हेरा पंचमी की परंपरा, जिसमें माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के रथ नंदीघोष को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त करती हैं। यह अनोखी परंपरा सदियों से ओडिशा के पुरी में निभाई जा रही है।
रथ यात्रा से जुड़ी है हेरा पंचमी की परंपरा
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जिसे उनकी मौसी का घर माना जाता है। वहां भगवान कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं।
मान्यता है कि यात्रा पर निकलते समय भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी से शीघ्र लौटने का वचन देते हैं, लेकिन गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद वे वहीं ठहर जाते हैं। इससे माता लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं।
पांचवें दिन माता लक्ष्मी पहुंचती हैं गुंडिचा मंदिर
रथ यात्रा के पांचवें दिन, जिसे हेरा पंचमी कहा जाता है, माता लक्ष्मी पालकी में सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। वहां वह भगवान जगन्नाथ से शीघ्र वापस लौटने की शिकायत करती हैं। भगवान उन्हें जल्द लौटने का आश्वासन देते हैं।
क्यों तोड़ा जाता है भगवान जगन्नाथ का रथ?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान के आश्वासन से भी जब माता लक्ष्मी का क्रोध शांत नहीं होता, तब लौटते समय वह भगवान जगन्नाथ के रथ नंदीघोष को प्रतीकात्मक रूप से आंशिक क्षति पहुंचाती हैं। यह उनके रुष्ट होने का प्रतीक माना जाता है।
इसके बाद भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को मनाते हैं और उन्हें वापस श्रीमंदिर लौटने का विश्वास दिलाते हैं। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष हेरा पंचमी की लीला का आयोजन किया जाता है।
आज भी निभाई जाती है यह परंपरा
पुरी में आज भी हेरा पंचमी के अवसर पर इस पूरी धार्मिक परंपरा का जीवंत मंचन किया जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस अनूठी लीला के साक्षी बनते हैं। यह परंपरा भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के प्रेम, मान-मनुहार और दांपत्य संबंधों के भावनात्मक पक्ष को दर्शाती है।
