सेवा तीर्थ में पहली बार जुटा मोदी मंत्रिमंडल, नये कार्यालय को बताया राष्ट्र के नवनिर्माण का सशक्त प्रतीक

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फाल्गुन मास की शुक्ल अष्ठमी, मंगलवार को पहली बार यहां नवनिर्मित प्रधानमंत्री कार्यालय भवन ‘सेवा तीर्थ’ में अपनी पहली बैठक में ‘सेवा संकल्प’ प्रस्ताव पारित किया और इसे भारत की विकास यात्रा में एक नया आरंभ बताया।

इस प्रस्ताव में पिछले एक दशक की उपलब्धियों और सुधारों को गिनाते हुए संकल्प व्यक्त किया गया है कि यह सरकार सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाते हुए भारत को निकट भविष्य में विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए काम करेगी। प्रस्ताव में भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के प्रति मंत्रिमंडल की प्रतिबद्धता और समर्पण भी व्यक्त किया गया है।

कैबिनेट द्वारा स्वीकृत ‘ सेवा संकल्प’ में कहा गया है, ” आज युगाब्द 5127, विक्रम संवत 2082, शक संवत् 1947, फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष..अष्टमी के दिन…24 फरवरी, 2026 को, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की अध्यक्षता में, नए प्रधानमंत्री कार्यालय ‘सेवा तीर्थ’ में केंद्रीय मंत्रिमंडल की ऐतिहासिक प्रथम बैठक आयोजित हो रही है।”

नये भवन को नये भारत के निर्माण की अभिव्यक्ति बताते हुए प्रस्ताव में कहा गया है, ‘ यह बैठक एवं यह भवन नए भारत के नवनिर्माण की एक प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। इस शुभारंभ के साथ ही हम उस भविष्य का स्वागत कर रहे हैं, जिसके निर्माण में सदियों का श्रम लगा है। आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय साउथ ब्लॉक में इतने दशकों तक सरकारों ने विरासत को संभाला और भविष्य के सपने देखे। हमने एक ऐसे भारत के सपने देखे, जिसकी सोच स्वदेशी हो, स्वरूप आधुनिक हो, और सामर्थ्य अनंत हो। आज यह सेवातीर्थ उसी संकल्पना का वह मूर्तिमान अवतार है जो लोकतन्त्र की जननी के रूप में भारत के गौरव को बढ़ाएगा।”

नये प्रधानमंत्री कार्यालय के स्थान के अंग्रेजों के राज के दौर के बैरक वाले इतिहास को याद करते हुए प्रस्ताव में कहा गया है, ” आज इस अवसर पर इस स्थान के इतिहास को भी स्मरण कर रहे हैं। ‘सेवा तीर्थ’ उन अस्थायी बैरकों के स्थान पर बना है, जो ब्रिटिश काल के थे। उस स्थान पर राष्ट्र संचालन के सक्रिय संस्थान का निर्माण नये भारत के कायाकल्प का भी प्रतीक है।”

प्रस्ताव में आगे कहा गया है, ‘गुलामी के कालखंड से पहले भारत की पहचान एक ऐसे राष्ट्र के रूप में होती थी जो एक ओर अपनी भौतिक भव्यता के लिए भी जाना जाता था, और दूसरी ओर अपने मानवीय मूल्यों के लिए। सेवातीर्थ की संकल्पना इन दोनों ही आदर्शों से मिलकर बनी है। कर्तव्य, सेवा और समर्पण की त्रिवेणी से यह कार्यस्थल एक तीर्थ की भांति पवित्र हो, यह इसकी मूलभावना है।”

इसमें कहा गया है, ‘सेवा तीर्थ’ में हो रही इस पहली बैठक के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल यह संकल्प दोहराता है कि यहां लिया गया हर निर्णय 140 करोड़ देशवासियों के प्रति सेवा-भाव से प्रेरित होगा और राष्ट्र-निर्माण के व्यापक लक्ष्य से जुड़ा होगा। ”

भारत के संविधान को सरकार की नैतिक प्रतिबद्धता बताते हुए प्रस्ताव में कहा गया है, ” हमारे लिए संवैधानिक मूल्य उस नैतिक प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति हैं, जो शासन को नागरिक की गरिमा, समानता और न्याय से जोड़ती है। ‘सेवा तीर्थ’ की कार्य-संस्कृति इसी आत्मा से संचालित होगी, जहां हर नीति संविधान की मूल भावना के अनुरूप होगी और हर निर्णय देशवासियों की आकांक्षाओं के प्रति उत्तरदायी होगा।”

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