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20 पुलिसकर्मियों का ट्रांसफर रद्द; कहा— ‘सजा देने के लिए तबादले का इस्तेमाल नहीं कर सकता विभाग’

रांची : झारखंड उच्च न्यायालय ने धनबाद जिला पुलिस बल से दूसरे जिलों में भेजे गए 20 पुलिसकर्मियों के स्थानांतरण आदेश को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि विभाग ‘प्रशासनिक आवश्यकता’ के नाम पर किसी कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकता।

अदालत का सख्त रुख: ‘प्रक्रिया का पालन अनिवार्य’
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि स्थानांतरण एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन इसे दंडात्मक कार्रवाई (Punitive Action) के रूप में इस्तेमाल करना कानून का उल्लंघन है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ता तुरंत अपने मूल कार्यस्थल धनबाद में योगदान दें। संबंधित अधिकारी बिना किसी देरी के उनकी जॉइनिंग स्वीकार करें।

यदि किसी पुलिसकर्मी पर लापरवाही या अनुशासनहीनता का आरोप है, तो विभाग को नियमानुसार विभागीय जांच करनी चाहिए, न कि सीधे ट्रांसफर कर देना चाहिए।

RTI से खुला राज: ‘प्रशासनिक जरूरत’ नहीं, ‘सजा’ था तबादला
याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता अर्पण मिश्रा ने अदालत को चौंकाने वाली जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 24 फरवरी 2025 को इन पुलिसकर्मियों का तबादला ‘प्रशासनिक आवश्यकता’ बताकर किया गया था। लेकिन जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी गई, तो पता चला कि धनबाद एसएसपी ने कथित लापरवाही के आधार पर इनके स्थानांतरण की सिफारिश की थी।

अदालत ने ‘सोमेश तिवारी बनाम भारत संघ’ मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जो स्थानांतरण आदेश दुर्भावनापूर्ण या दंडात्मक प्रकृति का हो, वह कानून की नजर में टिक नहीं सकता।

कौन हैं याचिकाकर्ता?
इस मामले में सूरज कुमार दास, अनुज कुमार सिंह, बलजीत कुमार, कौशल कुमार दुबे सहित कुल 20 पुलिसकर्मियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। ये सभी लंबे समय से धनबाद में तैनात थे और विभाग के अचानक लिए गए इस फैसले से प्रभावित हुए थे।

प्रशासन के लिए बड़ा संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस प्रशासन के लिए एक नजीर साबित होगा। यह स्पष्ट करता है कि स्थानांतरण की शक्ति का उपयोग कर्मचारियों को प्रताड़ित करने या शॉर्टकट तरीके से सजा देने के लिए नहीं किया जा सकता।

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