
तनवीर जाफरी
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद वर्ष 1945 में अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में वैश्विक मान्यता मिली। परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र के गठन में अमेरिका की अहम भूमिका रही। इसी दौर में अमेरिकी डॉलर ने भी अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत जगह बनानी शुरू कर दी।
वहीं, सोवियत संघ को भी दूसरी बड़ी महाशक्ति के रूप में देखा जाता था, लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका अकेली वैश्विक महाशक्ति बनकर उभरा। इसके बाद अमेरिका ने खुद को केवल आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक मामलों में निर्णायक भूमिका निभाने वाली ताकत के रूप में स्थापित किया।
अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और सैन्य विस्तार
अमेरिका ने दुनिया के कई देशों में सैन्य अड्डे स्थापित किए और बड़ी संख्या में अपने सैनिकों की तैनाती की। अनुमान के अनुसार, अमेरिका के सैकड़ों सैन्य ठिकाने दुनिया के विभिन्न देशों में मौजूद हैं। इनमें स्थायी सैन्य अड्डे, वायुसेना केंद्र, नौसैनिक ठिकाने और रणनीतिक संचालन केंद्र शामिल हैं।
जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई है। अमेरिका ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में अपनी भूमिका को मजबूत करने के लिए विभिन्न देशों के साथ रक्षा समझौते भी किए।
चीन का तेजी से उभरना
दूसरी ओर, पिछले चार दशकों में चीन एक बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरा है। 1978 के बाद आर्थिक सुधारों के जरिए चीन ने तेज विकास किया और आज वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।
निर्माण क्षेत्र, निर्यात, विदेशी निवेश, तकनीकी विकास और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत भूमिका ने चीन को विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बना दिया। इसके साथ ही चीन ने अपनी सेना, नौसेना, मिसाइल तकनीक और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भी भारी निवेश किया।
5जी तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान और उच्च तकनीकी निर्माण के क्षेत्र में चीन की प्रगति ने उसकी वैश्विक छवि को मजबूत किया। बेल्ट एंड रोड पहल के माध्यम से चीन ने एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में बुनियादी ढांचे से जुड़े निवेश किए और अपनी कूटनीतिक पकड़ बढ़ाई।
अमेरिका और चीन की नीतियों में अंतर
अमेरिका और चीन की वैश्विक नीतियों में बड़ा अंतर यह रहा कि चीन ने कई देशों के साथ आर्थिक सहयोग और निवेश के जरिए संबंध मजबूत करने की कोशिश की, जबकि अमेरिका पर कई बार दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोप लगते रहे हैं।
आलोचकों का मानना है कि अमेरिका ने कई मौकों पर सैन्य शक्ति और राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल किया, जबकि चीन ने आर्थिक साझेदारी और विकास परियोजनाओं के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ाया।
वैश्विक सर्वे में बदली तस्वीर
अमेरिका की वैश्विक छवि में बदलाव का संकेत हाल के अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में भी देखने को मिला है। अमेरिकी शोध संस्था प्यू रिसर्च सेंटर के एक सर्वे के अनुसार, कई देशों में चीन के प्रति सकारात्मक धारणा बढ़ी है।
सर्वे में शामिल 36 देशों में से बड़ी संख्या में लोगों ने चीन को आर्थिक साझेदार और स्थिर शक्ति के रूप में देखा। वहीं, कुछ देशों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रति भरोसा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में अधिक पाया गया।
कनाडा, मैक्सिको, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों में भी कई लोगों ने ट्रंप के नेतृत्व को लेकर कम भरोसा जताया।
ट्रंप प्रशासन के फैसलों का असर
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को अमेरिका की घटती वैश्विक स्वीकार्यता का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। सहयोगी देशों के साथ तनावपूर्ण संबंध, व्यापार विवाद, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति कठोर रुख, विदेशी सहायता में कटौती और प्रवासियों व मुस्लिम देशों को लेकर दिए गए विवादित बयान उनकी छवि को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल रहे हैं।
नाटो, यूरोपीय संघ और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों को लेकर ट्रंप के रुख ने भी कई देशों में चिंता पैदा की। इसके अलावा मध्य पूर्व, ईरान-इस्राइल तनाव, वेनेजुएला और यूक्रेन जैसे मुद्दों पर उनकी नीतियों को लेकर भी सवाल उठे।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका का प्रभाव अभी भी मजबूत है, लेकिन ट्रंप प्रशासन की कई नीतियों ने अमेरिका की विश्वसनीयता और साख को चुनौती जरूर दी है। आने वाले समय में अमेरिका को अपनी वैश्विक भूमिका बनाए रखने के लिए सहयोग, कूटनीति और भरोसे पर अधिक ध्यान देना होगा।


