हृदय रोग को अक्सर धूम्रपान, मोटापा, उच्च रक्तचाप और अस्वस्थ जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में इसकी वजह आनुवंशिक भी हो सकती है। यदि परिवार में किसी सदस्य को कम उम्र में हार्ट अटैक, अचानक कार्डियक अरेस्ट या गंभीर हृदय रोग हुआ है, तो अन्य परिजनों में भी हृदय रोग का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में समय पर जांच और नियमित स्क्रीनिंग बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
क्या हृदय रोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंच सकता है
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ हृदय संबंधी बीमारियां जीन में होने वाले बदलाव के कारण माता-पिता से बच्चों तक पहुंच सकती हैं। यदि किसी व्यक्ति के माता या पिता में आनुवंशिक हृदय रोग की पुष्टि हो चुकी है, तो बच्चों में भी उसके विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति में बीमारी हो, लेकिन जीवनशैली और अन्य पर्यावरणीय कारक इसके जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
कौन-से संकेत बताते हैं कि बीमारी आनुवंशिक हो सकती है
यदि परिवार में पुरुषों में 55 वर्ष से पहले या महिलाओं में 65 वर्ष से पहले हार्ट अटैक हुआ हो, अचानक कार्डियक अरेस्ट का इतिहास हो, व्यायाम के दौरान बेहोशी आती हो, धड़कन बार-बार तेज या अनियमित होती हो, कम उम्र में हार्ट फेलियर हुआ हो या परिवार के कई सदस्यों को पेसमेकर अथवा आईसीडी लगवानी पड़ी हो, तो इसे गंभीर संकेत माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में कार्डियोलॉजिस्ट से परामर्श लेना आवश्यक है।
ये आनुवंशिक हृदय रोग बढ़ा सकते हैं जोखिम
कार्डियोमायोपैथी में हृदय की मांसपेशियां असामान्य रूप से मोटी या कमजोर हो सकती हैं और कई बार यह युवाओं में अचानक कार्डियक अरेस्ट का कारण बन जाती है। इनहेरिटेड अरिदमिया जैसे लॉन्ग क्यूटी सिंड्रोम और सीपीवीटी हृदय की विद्युत प्रणाली को प्रभावित कर धड़कन को अनियमित बना सकते हैं। मार्फन सिंड्रोम में महाधमनी के फैलने और फटने का खतरा बढ़ जाता है। वहीं फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रॉलेमिया में जन्म से ही एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत अधिक होता है, जिससे कम उम्र में हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। कुछ दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियों में हृदय में ट्यूमर बनने की संभावना भी बढ़ जाती है।
कब करानी चाहिए जांच
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि परिवार में कम उम्र में हृदय रोग या अचानक मृत्यु का इतिहास है, तो केवल लक्षण आने का इंतजार नहीं करना चाहिए। समय पर ईसीजी, ईकोकार्डियोग्राफी, होल्टर मॉनिटरिंग, लिपिड प्रोफाइल और आवश्यकता होने पर जेनेटिक जांच कराई जानी चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, वजन नियंत्रण, धूम्रपान से दूरी और रक्तचाप तथा कोलेस्ट्रॉल की निगरानी से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि हर हृदय रोग केवल खराब जीवनशैली का परिणाम नहीं होता। कई मामलों में आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक, अचानक कार्डियक अरेस्ट या किसी वंशानुगत हृदय रोग का इतिहास है, तो समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह लेकर गंभीर जटिलताओं के खतरे को काफी हद तक घटाया जा सकता है।



