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आजादी से एक दिन पहले कैसा था भारत? संशय, दंगों और तिरंगे की उम्मीद के बीच गुजरी 14 अगस्त की रात

विजय केसरी ( कथाकार / स्तंभकार)

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। देश इस ऐतिहासिक दिन की 79वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। आजादी की इस गौरवशाली यात्रा पर हर साल अनेक लेख लिखे जाते हैं, लेकिन 14 अगस्त 1947 यानी आजादी से ठीक एक दिन पहले देश किस दौर से गुजर रहा था, यह सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उस समय देशवासियों के मन में आजादी की खुशी के साथ कई आशंकाएं भी थीं। चारों तरफ विभाजन की त्रासदी, दंगे और विस्थापन का दर्द था। लोगों की नजरें दिल्ली पर टिकी थीं और उन्हें इंतजार था कि आखिर कब गुलामी का प्रतीक यूनियन जैक उतरेगा और तिरंगा शान से लहराएगा।

आजादी की खुशी के साथ मन में था संशय

14 अगस्त 1947 का दिन देशवासियों के लिए बेहद बेचैनी और इंतजार से भरा था। अंग्रेजों के भारत छोड़ने की घोषणा हो चुकी थी, लेकिन लंबे समय की गुलामी और अंग्रेजी हुकूमत के तौर-तरीकों को देखते हुए लोगों को अंतिम क्षण तक भरोसा नहीं हो रहा था कि सचमुच सत्ता भारतीयों को सौंप दी जाएगी।

लोगों के मन में सवाल था कि क्या अंग्रेज अपना फैसला बदल सकते हैं? क्या दिल्ली के तख्त से यूनियन जैक सचमुच उतरेगा? क्या राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा वहां फहराया जाएगा? देशभर में लोग रेडियो से आने वाली खबरों पर नजर रखे हुए थे। जहां कहीं रेडियो उपलब्ध था, वहां लोग समूह बनाकर समाचार सुन रहे थे।

आजादी के लिए वर्षों तक चले संघर्ष ने देशवासियों में एक अलग तरह का आत्मविश्वास पैदा किया था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष और तेज हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो चुकी थी। ऐसे हालात में अंग्रेजी शासन के लिए भारत पर अपना नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल होता गया।

विभाजन ने आजादी की खुशी को कर दिया था लहूलुहान

भारत की आजादी के साथ ही देश का विभाजन भी हुआ। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के नए राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भारत में आजादी की खुशी के साथ विभाजन का गहरा दर्द भी मौजूद था। देश के कई हिस्से सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहे थे।

लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर भारत और पाकिस्तान के बीच पलायन कर रहे थे। दोनों ओर से आने-जाने वाली कई ट्रेनों में जिंदा लोगों के बजाय लाशें पहुंच रही थीं। इस रक्तपात ने आजादी के उत्सव को भी गहरे दर्द से भर दिया था।

महात्मा गांधी भी 15 अगस्त के दिल्ली के मुख्य कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। वह उस समय बंगाल के नोआखली में सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और लोगों के बीच शांति स्थापित करने के प्रयास में जुटे थे। देश आजादी की दहलीज पर था, लेकिन गांधी का मन उन लोगों के बीच था जो हिंसा की आग में अपना सब कुछ खो रहे थे।

दिल्ली की ओर टिकी थीं करोड़ों आंखें

आजादी से पहले देश के करोड़ों लोगों की निगाहें दिल्ली पर थीं। लोगों के बीच आजादी को लेकर चर्चाएं थीं और साथ ही कई तरह की अफवाहें भी फैल रही थीं। बहुत से लोग उपवास और प्रार्थना कर रहे थे। उनकी एक ही कामना थी कि वर्षों का संघर्ष सफल हो और देश वास्तव में स्वतंत्र हो।

दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, आचार्य कृपलानी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, गुलजारीलाल नंदा, मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री समेत अनेक प्रमुख नेता उस ऐतिहासिक क्षण की तैयारी में जुटे थे।

उधर, देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग रात बीतने का इंतजार कर रहे थे। समय जैसे थम गया था। हर समाचार के साथ लोगों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। आखिरकार वह घड़ी आई, जब सदियों की गुलामी का अंत हुआ और स्वतंत्र भारत ने नई यात्रा शुरू की।

तिरंगा फहरते ही छलक पड़े खुशी के आंसू

15 अगस्त 1947 की आधी रात के बाद भारत स्वतंत्र राष्ट्र बन गया। दिल्ली में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया और देशभर में खुशी की लहर दौड़ गई। भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से वातावरण गूंज उठा। लोग एक-दूसरे से गले मिले और आजादी की बधाई दी।

कई घरों में ढोल-नगाड़े, ताशे, शहनाई और बांसुरी बजने लगी। लोगों ने थालियां बजाकर अपनी खुशी जाहिर की। लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी की खुशी में अनेक लोगों की आंखों से आंसू भी छलक पड़े।

15 अगस्त की सुबह भारत के लिए एक नई सुबह थी। देशवासियों ने गुलामी की लंबी रात के बाद स्वतंत्रता का सूर्योदय देखा था। हालांकि इस आजादी के साथ विभाजन का गहरा घाव भी मिला था, लेकिन करोड़ों भारतीयों के लिए यह दिन उस संघर्ष की जीत का प्रतीक बन गया, जिसमें अनगिनत लोगों ने अपना जीवन, सुख और भविष्य देश के नाम कर दिया था।

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