सावन मास में आने वाली शिवरात्रि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। शिवपुराण के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर वर्षभर की मासिक शिवरात्रियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करने से पापों का नाश होता है तथा जीवन के कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं।
निषाद की कथा का महत्व
शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार प्राचीन समय में गुरुद्रह नाम का एक निषाद रहता था, जो शिकार और चोरी जैसे दुष्कर्मों में लिप्त था। एक बार सावन शिवरात्रि के दिन वह अपने परिवार के लिए भोजन की तलाश में जंगल गया, लेकिन पूरे दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला। रात होने पर वह एक सरोवर के पास स्थित बेल वृक्ष पर चढ़कर शिकार की प्रतीक्षा करने लगा।
उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। शिकार पर निशाना साधते समय उसके हाथ से जल और बेलपत्र बार-बार शिवलिंग पर गिरते रहे। अनजाने में ही उसके द्वारा चारों प्रहर भगवान शिव का पूजन संपन्न हो गया।
रात के दौरान तीन हिरनियां और एक हिरन जल पीने के लिए वहां पहुंचे। प्रत्येक ने अपने परिवार को अंतिम बार देखने के लिए थोड़ी देर का समय मांगा और लौट आने का वचन दिया। निषाद ने उन्हें जाने दिया। कुछ समय बाद वे सभी अपने वचन के अनुसार वापस लौट आए। उनकी सत्यनिष्ठा, करुणा और परोपकार की भावना देखकर निषाद का हृदय परिवर्तन हो गया और उसने शिकार करने का विचार त्याग दिया।
भगवान शिव ने दिया मोक्ष का वरदान
निषाद के पश्चाताप और अनजाने में किए गए शिवपूजन से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसे मोक्ष का वरदान दिया। कथा के अनुसार बाद में उसे भगवान श्रीराम का दर्शन भी प्राप्त हुआ और अंततः वह मुक्ति को प्राप्त हुआ। हिरन और हिरनियों को भी दिव्य गति प्राप्त हुई।
व्रत का संदेश
सावन शिवरात्रि की यह कथा सत्य, करुणा, वचनपालन और भगवान शिव की अनंत कृपा का संदेश देती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, रात्रि जागरण करने और इस कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं।


