नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान, संस्कार और जीवन के सही मार्ग का मार्गदर्शक माना गया है। शास्त्रों और संतों की वाणी में गुरु के महत्व का विस्तृत वर्णन मिलता है। माना गया है कि गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण कर उसे जीवन में सफलता और आत्मिक उन्नति की राह भी दिखाता है।
गुरु शिष्य के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे सही दिशा देते हैं। उनके मार्गदर्शन से व्यक्ति में विनम्रता, आत्मविश्वास, विवेक और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है। गुरु के सान्निध्य से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है और भ्रम, भय तथा अहंकार दूर होते हैं।
कबीर ने बताया गुरु का महत्व
संत कबीर ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि यदि पूरी पृथ्वी कागज, सभी वन लेखनी और सातों समुद्र स्याही बन जाएं, तब भी गुरु के गुणों का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता।
“सब धरनी कागद करूं, लेखनि सब बनराय।
सात समुंद की मसि करूं, गुरुगुण लिखा न जाए।”
कबीर के अनुसार गुरु का स्थान अत्यंत ऊंचा है। उनका मानना है कि परमात्मा से परलोक का कल्याण होता है, जबकि गुरु लोक और परलोक दोनों का मार्ग प्रशस्त करता है।
ज्ञान और मुक्ति का आधार हैं गुरु
धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि गुरु के बिना सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। ज्ञान के बिना न भक्ति संभव है, न मुक्ति और न ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है।
संस्कृत का प्रसिद्ध श्लोक भी गुरु की महिमा को दर्शाता है—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥”
उपनिषदों में भी कहा गया है कि जिस प्रकार भगवान के प्रति श्रद्धा रखी जाती है, उसी प्रकार गुरु के प्रति भी श्रद्धा होनी चाहिए। गुरु के मार्गदर्शन से ही जीवन में ज्ञान, विवेक और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
