जापानी पीएम सनाए ताकाइची कल आएंगी भारत, चीन की बढ़ेगी टेंशन!

टोक्यो। जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची एक जुलाई (बुधवार) से भारत के तीन दिवसीय द्विपक्षीय दौरे पर आ रही हैं। नई दिल्ली में वह अपने समकक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ शिखर बैठक करेंगी। जापान सरकार के अनुसार, इस हाई-प्रोफाइल दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले जाना है।

आर्थिक सुरक्षा पर जारी होगा साझा घोषणापत्र

जापान सरकार के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि इस दौरे के दौरान नई दिल्ली में दोनों देश ‘आर्थिक सुरक्षा’ पर एक संयुक्त घोषणापत्र जारी कर सकते हैं। इस घोषणापत्र में किसी भी देश द्वारा बनाए जाने वाले अवांछित ‘आर्थिक दबाव’ के विरोध का सीधा जिक्र होने की प्रबल संभावना है, जिसे वैश्विक राजनीति में बेहद अहम माना जा रहा है।

इन 5 सेक्टर्स में लगेगी समझौतों की झड़ी

‘जापान टुडे’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों दिग्गज नेताओं के बीच पांच सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने पर अंतिम सहमति बनेगी। इनमें शामिल हैं:

  • सेमीकंडक्टर और आधुनिक तकनीक
  • रेयर अर्थ (दुर्लभ खनिज) जैसे अहम मिनरल्स
  • सूचना और संचार तकनीक (ICT)
  • स्वच्छ और हरित ऊर्जा (Clean Energy)
  • मेडिकल और स्वास्थ्य संबंधी सामान

“फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” पर रहेगा मुख्य फोकस

पिछले साल अक्टूबर में सत्ता संभालने के बाद पीएम सनाए ताकाइची का यह पहला भारत दौरा है। जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने इस दौरे की घोषणा करते हुए कहा कि टोक्यो का लक्ष्य निवेश, इनोवेशन और आर्थिक सुरक्षा के दम पर भारत के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करना है। सरकार के मुख्य प्रवक्ता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ किया कि “मुक्त और खुले इंडो-पैसिफिक” (Free and Open Indo-Pacific) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत-जापान की दोस्ती दुनिया के लिए सबसे जरूरी है।

बदले वैश्विक समीकरणों के बीच अहम है यह दौरा

यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पूर्वी एशिया और दक्षिण एशिया के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ जहां बीजिंग और टोक्यो के बीच ताइवान के मुद्दे को लेकर तनाव चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ हिमालयी सीमा पर चीन के साथ भारत का भी पुराना क्षेत्रीय विवाद है। ऐसे में दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की यह मुलाकात एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और व्यापारिक संतुलन के लिहाज से मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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