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रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की 100% टैरिफ धमकी, भारत के सामने बढ़ी चुनौती

नई दिल्ली। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना भारत के लिए अब आर्थिक फायदे के साथ-साथ रणनीतिक चुनौती भी बनता जा रहा है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसा विधेयक पारित किया है, जिसके कानून बनने पर अमेरिकी राष्ट्रपति रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगा सकते हैं। भारत भी इसकी संभावित चपेट में आ सकता है।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा है कि भारत को अमेरिकी टैरिफ की धमकी के आधार पर अपनी ऊर्जा नीति तय नहीं करनी चाहिए। संस्था के मुताबिक, जब तक रूस से कच्चा तेल व्यावसायिक रूप से फायदेमंद है, भारत को इसकी खरीद जारी रखनी चाहिए। साथ ही अमेरिका के साथ बातचीत के जरिए मतभेद सुलझाने पर जोर देना चाहिए।

रूस से 40.8 अरब डॉलर का तेल आयात

जीटीआरआई के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में भारत ने कुल 134.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया था। इसमें रूस की हिस्सेदारी 40.8 अरब डॉलर यानी करीब 30.3% रही। सस्ते रूसी तेल से भारत को तेल आयात बिल घटाने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिली है।

जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को टैरिफ की धमकियों के आधार पर अपनी ऊर्जा नीति नहीं बदलनी चाहिए। उनके मुताबिक, रूसी तेल व्यावसायिक रूप से लाभदायक रहने तक इसकी खरीद जारी रखनी चाहिए। हालांकि, अमेरिका के साथ मतभेदों को मजबूती से बातचीत के जरिए सुलझाना होगा और एकतरफा रियायतों से बचना चाहिए।

अमेरिका से भी बढ़ी ऊर्जा खरीद

जीटीआरआई ने बताया कि भारत अमेरिका से भी लगातार ऊर्जा खरीद बढ़ा रहा है। वित्त वर्ष 2026 में अमेरिकी कच्चे तेल का आयात 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 9.1 अरब डॉलर हो गया। वहीं, अमेरिका से भारत की कुल ऊर्जा खरीद 12.5 अरब डॉलर तक पहुंच गई। इसमें 1.4 अरब डॉलर की एलएनजी, 896 मिलियन डॉलर की एलपीजी और 861 मिलियन डॉलर का पेट्रोलियम कोक शामिल था।

रूस से तेल खरीद के कारण भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ने की आशंका है, क्योंकि प्रस्तावित कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अलग-अलग देशों पर टैरिफ तय करने का व्यापक अधिकार देता है। कानून लागू होने के 30 दिन बाद भी रूसी कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।

भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता की चुनौती

जीटीआरआई का कहना है कि टैरिफ को विदेश नीति के लक्ष्यों को हासिल करने के साधन के तौर पर इस्तेमाल करना चिंता का विषय है। संस्था के अनुसार, व्यापार शुल्क और अन्य प्रतिबंधों का इस्तेमाल अब रणनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि रूसी तेल छोड़ने पर ऊर्जा लागत बढ़ सकती है, जबकि अमेरिकी टैरिफ का सामना करने पर भारतीय निर्यात प्रभावित होने का खतरा रहेगा। ऐसे में सरकार को ऊर्जा सुरक्षा, सस्ती आपूर्ति और रणनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। जीटीआरआई का सुझाव है कि फिलहाल आर्थिक रूप से लाभदायक रूसी तेल की खरीद जारी रखते हुए अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत को मजबूत किया जाए।

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