आजकल डायबिटीज, प्रीडायबिटीज और वजन कम करने वालों के बीच लो-ग्लाइसेमिक डाइट तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसमें ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल किया जाता है, जो खाने के बाद रक्त में शुगर का स्तर तेजी से बढ़ाने के बजाय धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। इससे लंबे समय तक ऊर्जा बनी रह सकती है, भूख कम लग सकती है और इंसुलिन पर अचानक दबाव कम हो सकता है।
लो-ग्लाइसेमिक डाइट क्या होती है?
लो-ग्लाइसेमिक डाइट में मुख्य रूप से ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 या उससे कम होता है। इनसे मिलने वाला ग्लूकोज धीरे-धीरे रक्त में पहुंचता है, जिससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ने की संभावना कम होती है। इसके विपरीत सफेद ब्रेड, मीठे पेय और रिफाइंड आटे जैसे अधिक ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ रक्त शर्करा तेजी से बढ़ा सकते हैं।
इस डाइट में साबुत अनाज, दालें, फलियां, हरी सब्जियां, मेवे, बीज और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फलों को प्राथमिकता दी जाती है। यह केवल डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि संतुलित खानपान चाहने वाले स्वस्थ लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
ग्लाइसेमिक इंडेक्स और ग्लाइसेमिक लोड में अंतर
ग्लाइसेमिक इंडेक्स यह बताता है कि कोई खाद्य पदार्थ खाने के बाद रक्त शर्करा कितनी तेजी से बढ़ाता है। 55 या उससे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स को कम, 56 से 69 को मध्यम और 70 या उससे अधिक को उच्च माना जाता है।
वहीं ग्लाइसेमिक लोड केवल ग्लाइसेमिक इंडेक्स पर निर्भर नहीं करता, बल्कि भोजन में मौजूद कुल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को भी ध्यान में रखता है। इसलिए किसी खाद्य पदार्थ का वास्तविक प्रभाव समझने में ग्लाइसेमिक लोड भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उदाहरण के तौर पर तरबूज का ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है, लेकिन उसमें कार्बोहाइड्रेट कम होने के कारण उसका ग्लाइसेमिक लोड कम रहता है।
ब्लड शुगर और वजन पर कैसे पड़ता है असर?
कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ अपेक्षाकृत धीरे पचते हैं और उनका ग्लूकोज धीरे-धीरे रक्त में पहुंचता है। इससे इंसुलिन का स्राव अचानक बढ़ने के बजाय नियंत्रित रह सकता है। इसका लाभ टाइप-2 डायबिटीज, प्रीडायबिटीज और इंसुलिन प्रतिरोध वाले लोगों को मिल सकता है। कुछ अध्ययनों में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली डाइट से औसत रक्त शर्करा के स्तर में सुधार की संभावना भी सामने आई है।
वजन घटाने में भी यह डाइट मददगार हो सकती है। ऐसे भोजन से लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है, बार-बार भूख लगने और मीठा खाने की इच्छा में कमी आ सकती है। हालांकि, केवल कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ खाने से वजन अपने आप कम नहीं होता। कुल कैलोरी, पर्याप्त प्रोटीन, फाइबर और नियमित शारीरिक गतिविधि का ध्यान रखना भी जरूरी है।
क्या खाएं और किन बातों का रखें ध्यान?
लो-ग्लाइसेमिक डाइट में ओट्स, जौ, ब्राउन राइस और क्विनोआ जैसे साबुत अनाज, मसूर दाल, चना, राजमा और लोबिया जैसी दालें एवं फलियां शामिल की जा सकती हैं। पालक, ब्रोकली, लौकी, तोरी और भिंडी जैसी हरी सब्जियां भी बेहतर विकल्प हैं। सेब, नाशपाती, संतरा, अमरूद और चेरी जैसे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फलों को भी भोजन का हिस्सा बनाया जा सकता है। बादाम, अखरोट, अलसी और चिया बीज जैसे मेवे और बीज भी उपयोगी विकल्प हैं।
लो-ग्लाइसेमिक डाइट का मतलब कार्बोहाइड्रेट को पूरी तरह छोड़ना नहीं है, बल्कि सही प्रकार के कार्बोहाइड्रेट का चुनाव करना है। इसे संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली के साथ अपनाना अधिक प्रभावी हो सकता है। डायबिटीज की दवाएं लेने वाले लोगों को खानपान में बड़ा बदलाव करने से पहले चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए।



