अस्पताल प्रबंधन ने बिल के लिए प्रसुता व नवजात को बनाया बंधक

  • मामला रक्सौल के डंकन अस्पताल का, डीएम एवं प्रेस क्लब के हस्तक्षेप से मिली मुक्ति
  • कुष्ठ पीड़ित परिवार की 4 दिन की यातना, DM के हस्तक्षेप से मिली मुक्ति*

मोतिहारी/रक्सौल।

गरीबी और बीमारी की मार झेल रहे एक परिवार के लिए डंकन अस्पताल का बिस्तर, उम्मीद की जगह कैदखाना बन गया। रामगढ़वा कुष्ठ आश्रम के गणेश पासवान की बेटी ललिता कुमारी को 22 मई को प्रसव पीड़ा हुई तो परिजन उसे रक्सौल के डंकन अस्पताल ले गए। ऑपरेशन से बच्ची पैदा हुई। खुशी के आंसू सूखने से पहले ही 3500 रुपये जमा करने के बाद अस्पताल ने 75 हजार का बिल थमा दिया।
पीड़ित परिवार भीख मांग और कबाड़ चुनकर पेट पालता है। उनके पास इतनी रकम कहां से आती। आरोप है कि इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने प्रसूता ललिता, 4 दिन की नवजात बच्ची और विकलांग परिजनों को 4 दिनों तक परिसर में रोके रखा। न बिल भरने की ताकत, न जाने की इजाजत। एक मां, जो जच्चा-बच्चा के साथ देखभाल की मोहताज थी, वह बिल के बोझ तले घुट रही थी। नवजात को धूप-हवा नसीब नहीं थी, और एक पिता की लाचारी चीख-चीखकर पूछ रही थी कि “गरीब होना क्या गुनाह है?”

मामला तब खुला जब मोतिहारी प्रेस क्लब तक सूचना पहुंची। उन्होंने तुरंत अस्पताल से बात की और जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल को अवगत कराया। डीएम ने इसे मानवता के खिलाफ घटना मानते हुए अस्पताल प्रबंधन को फौरन निर्देश दिए। प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद बिना अतिरिक्त पैसा लिए ललिता, उसकी बच्ची और परिजनों को मुक्त कर दिया गया। मुक्ति के समय परिवार की आंखें नम थीं – दर्द की नहीं, राहत की।
घटना के बाद स्वास्थ्य संस्थानों की संवेदनशीलता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। क्या इलाज के बाद मरीज को “बंधक” बनाया जा सकता है? क्या आर्थिक तंगी किसी के जीने के अधिकार से बड़ी हो सकती है?

जब डंकन अस्पताल के निदेशक डॉ. प्रभु से बात की गई तो उन्होंने बंधक बनाने के आरोप से इनकार किया। उन्होंने कहा, “तीसरे बच्चे की प्लानिंग से पहले दंपति को अपनी आर्थिक स्थिति देखनी चाहिए थी। संस्था गरीबों की सेवा निःशुल्क करती है, लेकिन ऐसे मामलों में हाथ बंधे होते हैं। अंततः सभी शुल्क माफ कर परिवार को छोड़ दिया गया।
फिलहाल ललिता और उसकी बच्ची घर लौट आई हैं। जिला प्रशासन और प्रेस क्लब के प्रति उन्होंने आभार जताया है। लेकिन यह घटना एक कड़वा सवाल छोड़ गई है कि क्या अस्पताल, सेवा का मंदिर हैं या बिल का कारागार?

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