रांची। राजधानी रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में आयोजित रथयात्रा महोत्सव का समापन 25 जुलाई को घुरती रथयात्रा (बहुड़ा यात्रा) के साथ होगा। नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में प्रवास करने के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की भव्य वापसी मुख्य मंदिर में कराई जाएगी। इस धार्मिक आयोजन में हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।
घुरती रथयात्रा का विशेष महत्व
घुरती रथयात्रा, जिसे बहुड़ा यात्रा भी कहा जाता है, रथयात्रा महोत्सव का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मौसीबाड़ी में नौ दिन बिताने के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा पुनः अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं। इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। श्रद्धालु इसे भगवान और भक्तों के पुनर्मिलन का प्रतीक मानते हैं।
मेले की रौनक अंतिम चरण में
रथ मेले के अंतिम दिनों में मंदिर परिसर और मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। बच्चों के लिए झूले और मनोरंजन के साधन आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, जबकि विभिन्न दुकानों पर खरीदारी भी जारी है। घुरती रथयात्रा के बाद मेले का समापन हो जाएगा और मंदिर परिसर में नियमित धार्मिक गतिविधियां शुरू हो जाएंगी।
चातुर्मास का भी होगा आरंभ
25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास की शुरुआत भी होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी कारण भगवान जगन्नाथ के विशेष दर्शन सीमित हो जाते हैं और केवल नियमित पूजा-अर्चना जारी रहती है। देवोत्थान एकादशी के बाद पुनः विशेष धार्मिक अनुष्ठान और दर्शन प्रारंभ होते हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
धार्मिक विद्वानों के अनुसार घुरती रथयात्रा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, सामुदायिक सहभागिता और आस्था का प्रतीक है। यह आयोजन श्रद्धालुओं को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।


