प्रेरणा : पत्तलों से बदली तकदीर, मनोहरपुर की सरिता नायक बनीं महिला उद्यमिता की नई मिसाल, मज़दूरी छोड़ शुरू किया खुद का बिजनेस

पश्चिमी सिंहभूम। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड के पाथरबासा गांव की रहने वाली सरिता नायक ने यह साबित कर दिया है कि यदि सरकारी योजनाओं का सही लाभ, तकनीकी प्रशिक्षण और मजबूत इच्छाशक्ति हो, तो ग्रामीण महिलाएं भी आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख सकती हैं। कभी दिहाड़ी मजदूरी पर आश्रित रहने वाला उनका परिवार आज पत्तल-दोना निर्माण के स्वरोजगार से न सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त हो चुका है, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रहा है।

आर्थिक तंगी से था मुकाबला, कभी बच्चों की पढ़ाई भी थी मुश्किल

कुछ वर्ष पहले तक सरिता के परिवार की माली हालत बेहद खराब थी। रोज कमाना और रोज खाना ही उनके जीवन की हकीकत थी। आय के सीमित साधनों के कारण बच्चों की अच्छी पढ़ाई-लिखाई, बीमारी में इलाज और बुनियादी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता था। लेकिन इस भारी आर्थिक तंगी के बावजूद सरिता ने कभी हार नहीं मानी और खुद का काम शुरू करने के मौके तलाशती रहीं।

सरकारी योजना और तकनीकी प्रशिक्षण ने बदली किस्मत

सरिता के संघर्ष को तब एक नया मोड़ मिला जब उन्हें वन विभाग और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) की अभिसरण योजना के बारे में पता चला। इस योजना के तहत उन्हें न केवल निःशुल्क पत्तल-दोना निर्माण मशीन उपलब्ध कराई गई, बल्कि व्यापक प्रशिक्षण भी दिया गया।

उन्हें नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (NIF) के विशेषज्ञों द्वारा मशीन संचालन, आधुनिक उत्पादन तकनीक, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग और सफल विपणन (मार्केटिंग) के गुर सिखाए गए। इसके बाद सरिता ने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने घर से ही उत्पादन का काम शुरू कर दिया।

बाजार में बढ़ी मांग, स्थानीय स्तर पर खड़ा किया बड़ा रोजगार

शुरुआत में छोटे स्तर पर काम करने के बाद, सरिता के उत्पादों की बेहतर फिनिशिंग और गुणवत्ता के कारण बाजार में उनकी धाक जम गई। देखते ही देखते स्थानीय बाजारों, किराना दुकानों, होटलों, हाईवे के ढाबों और शादी-विवाह जैसे बड़े आयोजनों में उनके पत्तल-दोनों की मांग तेजी से बढ़ने लगी। इससे उनकी आमदनी में भारी इजाफा हुआ और परिवार का जीवनस्तर सुधरने लगा।

गांव की अन्य महिलाओं को भी बनाया आत्मनिर्भर

सरिता ने अपनी इस सफलता को सिर्फ खुद तक सीमित नहीं रखा। एक सच्ची उद्यमी की तरह उन्होंने अपने गांव पाथरबासा की अन्य महिलाओं को भी इस स्वरोजगार से जोड़ा। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को मशीन चलाने और पैकेजिंग का निःशुल्क प्रशिक्षण दिया, जिससे आज कई महिलाओं को घर बैठे ही अतिरिक्त आय का जरिया मिल गया है।

JSLPS और संबंधित जिला अधिकारियों के नियमित मार्गदर्शन में उनका यह लघु उद्योग लगातार आगे बढ़ रहा है। आज सरिता नायक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं दे पा रही हैं। उनकी यह कहानी आज पूरे झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की एक अद्भुत मिसाल बन चुकी है।

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