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भगवान परशुराम की प्रतिमा भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का सशक्त प्रतीक: राजेंद्रदास महाराज

जयपुर, 15 जून। रैवासा-मलूक पीठ वृंदावन के आग्रदेवाचार्य राजेंद्रदास महाराज ने अपने पूर्वोत्तर भारत प्रवास के दौरान पवित्र परशुराम कुंड का दौरा किया। वहाँ उन्होंने स्थापित भगवान परशुराम की 54 फीट ऊंची भव्य एवं विराट प्रतिमा का अवलोकन किया। प्रतिमा के अलौकिक और विहंगम स्वरूप को देखकर महाराज भावुक हो उठे और उन्होंने इसे अपने वर्षों पुराने संकल्प की सिद्धि करार दिया।

विप्र फाउंडेशन ने किया भव्य स्वागत

परशुराम कुंड आगमन पर विप्र फाउंडेशन की तिनसुकिया इकाई के पदाधिकारियों द्वारा पूज्य महाराज का आत्मीय स्वागत किया गया। इस विशेष अवसर पर परशुराम तीर्थ के संयोजक परमेश्वर शर्मा ने जानकारी दी कि विप्र फाउंडेशन के संस्थापक सुशील ओझा के विशेष अनुरोध पर आचार्य राजेंद्रदास जी महाराज संतों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ इस पावन तीर्थ स्थल पर पहुंचे थे।

वर्ष 2013 में लिया था प्रतिमा स्थापना का संकल्प

अपने पुराने अनुभवों को साझा करते हुए महाराज ने कहा कि वर्ष 2013 में जब वे साधु-संतों की टोली के साथ परशुराम कुंड में स्नान करने आए थे, तब उनके मन में यह तीव्र भाव जागा था कि इस पवित्र और ऐतिहासिक स्थल पर भगवान परशुराम की एक भव्य प्रतिमा स्थापित होनी चाहिए। आज उस संकल्प को धरातल पर साकार रूप में देखना उनके लिए अत्यंत संतोष और गहरे आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराने वाला क्षण है।

सनातन चेतना को मजबूत करेगी यह परियोजना

आचार्य राजेंद्रदास महाराज ने प्रतिमा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह भव्य प्रतिमा केवल एक स्थापत्य संरचना मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी समृद्ध भारतीय संस्कृति, अटूट सनातन परंपरा और भगवान परशुराम के महान आदर्शों का एक सशक्त प्रतीक है। उन्होंने परशुराम तीर्थ के सर्वांगीण विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि यह दूरदर्शी परियोजना पूरे देश में सनातन चेतना को और अधिक ऊर्जावान बनाने का काम करेगी।

परियोजना में रहा है महाराज का आर्थिक योगदान

गौरतलब है कि इस विशाल प्रतिमा स्थापना परियोजना को गति देने के लिए आचार्य राजेंद्रदास महाराज ने पूर्व में अपनी ओर से 1,11,111 रुपये की गुप्त/आर्थिक सहायता राशि भी प्रदान की थी। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने विप्र फाउंडेशन के निस्वार्थ प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की और इसे राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जागरण का एक बेहद महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक अभियान बताया।

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