नई दिल्ली। लंबे समय तक घी को दिल की बीमारियों का बड़ा कारण माना जाता रहा, लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस धारणा को पूरी तरह नहीं, बल्कि काफी हद तक चुनौती दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि घी को केवल उसके सैचुरेटेड फैट के आधार पर खतरनाक मान लेना सही नहीं है। असली सवाल यह है कि घी कितनी मात्रा में और किस तरह की डाइट के साथ खाया जा रहा है।
1950 के दशक में सैचुरेटेड फैट को हृदय रोगों से जोड़ने वाले शोधों के बाद घी को भी नुकसानदायक खाद्य पदार्थों की श्रेणी में रखा गया। हालांकि बाद के वर्षों में कई अध्ययनों ने संकेत दिया कि सभी प्रकार के सैचुरेटेड फैट का शरीर पर असर एक जैसा नहीं होता।
हाल में प्रकाशित एक मेटा-विश्लेषण में लगभग 20 हजार लोगों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें घी का सेवन करने वालों में हृदय रोग के जोखिम में हल्की बढ़ोतरी देखी गई, लेकिन औसतन उनके कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड स्तर में कोई स्पष्ट वृद्धि नहीं मिली। शोधकर्ताओं के अनुसार, जोखिम केवल घी से नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और पूरे आहार के स्वरूप से भी जुड़ा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि घी में ब्यूटिरिक एसिड, कंजुगेटेड लिनोलिक एसिड और विटामिन ए, डी, ई तथा के जैसे तत्व भी पाए जाते हैं। हालांकि यह घी को असीमित मात्रा में खाने की अनुमति नहीं देता, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि घी केवल सैचुरेटेड फैट का स्रोत भर नहीं है।
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित आहार के साथ सीमित मात्रा में घी का सेवन अधिकांश स्वस्थ लोगों के लिए सामान्यतः सुरक्षित माना जा सकता है। यदि इसे अत्यधिक मात्रा में या अधिक रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट वाले भोजन के साथ लिया जाए, तो जोखिम बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि घी को पूरी तरह त्यागने की बजाय उसकी मात्रा पर नियंत्रण और संतुलित आहार पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है। नई रिसर्च यह संकेत देती है कि घी के बारे में पुरानी चेतावनियों को अब अधिक संतुलित दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है।


